Wednesday, October 10, 2018

पटना : पांच लाख दो, सरकारी नौकरी लो, दो जालसाज गिरफ्तार

पटना : पांच लाख दो और सरकारी विभागों में नौकरी लो. कुछ इसी तर्ज पर जालसाजों की ओर से नौकरी देने का खेल खेला जा रहा था. जालसाजों ने जक्कनपुर थाने के मीठापुर बस स्टैंड में स्थित दर्पण होटल में किराये का कमरा लेकर नौकरी बांटने का कार्यालय बना रखा था. 
इसका खुलासा उस समय हुआ, जब पटना पुलिस की टीम ने गुप्त सूचना के आधार पर दर्पण होटल में छापेमारी की और वहां से दो जालसाजों ज्योति प्रकाश (शेखपुरा वासी)  व निकेश कुमार (बेल्छी वासी) को गिरफ्तार कर लिया गया.
 
उन दोनों के पास से  नकली वोटर आईडी, भारत सरकार का होलाेग्राम युक्त स्टिकर, लैपटॉप, कई छात्रों के एडमिट कार्ड, एक लाख नकद, मोबाइल फोन, एटीएम कार्ड, चेक व बाइकें बरामद की गयीं हैं. ये दोनों केंद्र सरकार, रेलवे व बिहार सरकार में विभिन्न पदों पर नौकरी के नाम पर छात्रों से लाखों रुपये की उगाही कर रहे थे. सूत्रों का कहना है कि दर्जनों छात्रों से ये लोग नौकरी दिलाने के नाम पर एडवांस के रूप में एक लाख से दो लाख ले चुके थे. 
 
इसके अलावा नौकरी में ग्रेड तृतीय के पदों पर नियुक्ति के लिए ये पांच लाख की डिमांड करते थे. इन लोगों के पास से कई एटीएम कार्ड व चेक बरामद किये गये हैं. नौकरी के लिए छात्रों ने इन्हें चेक से पैसे दिये थे. 
 
पुलिस इनके एटीएम कार्ड को खंगालने में जुटी है. एसएसपी मनु महाराज ने बताया कि गिरोह के अन्य सदस्यों के भी नामों की जानकारी मिली है और उन सभी को गिरफ्तार करने के लिए छापेमारी की जा रही है.
 
बनाते थे नकली वोटर आईकार्ड, बेच रहे थे भारतीय नागरिकता : इन दोनों शातिरों के पास से पुलिस ने फर्जी वोटर आईकार्ड बरामद किया है. इसके साथ ही वोटर आईकार्ड में लगने वाले भारत सरकार के होलोग्राम के स्टीकर भी मिले हैं. इन दोनों के पास भारत सरकार के होलोग्राम लगे स्टिकर कहां से आये हैं, यह आश्चर्य का विषय है.
पटना : संशोधित डीपीआर को कैबिनेट की मंजूरी के बाद पटना मेट्रो एक कदम और आगे बढ़ गया है. केंद्र सरकार की सैद्धांतिक सहमति प्राप्त करने के लिए स्वीकृत डीपीआर बुधवार को ही भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय, नीति आयोग और वित्त मंत्रालय को भेज दिया जायेगा. केंद्र व राज्य सरकार की सक्रियता को देखते हुए डेढ़ से दो महीने में प्रस्ताव पर सहमति मिलने की उम्मीद है. केंद्र की सहमति मिलते ही केंद्रांश राशि के साथ ही विदेशी कर्ज का रास्ता भी साफ हो जायेगा. 
 
7437.48 करोड़ खर्च करेगी राज्य सरकार
 
इसके साथ ही 7837.56 करोड़ रुपये का कर्ज एडीबी, जीका या बाहरी स्रोतों से कर्ज के तौर पर लिया जायेगा. केंद्र सरकार महज 2612.52 करोड़ ही देगी. यह प्रोजेक्ट पांच साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है. 
 
अब एक्टिव होगा पीएमआरसी      
 
कैबिनेट मंजूरी मिलते ही नवगठित पटना मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (पीएमआरसी) अब एक्टिव हो जायेगा. 2000 करोड़ रुपये अधिकृत पूंजी की इस कंपनी के चेयरमैन (चैतन्य प्रसाद, नगर विकास एवं आवास विभाग) और एक निदेशक (संजय दयाल, विशेष सचिव, नगर विकास एवं आवास विभाग) अधिसूचित हो चुके हैं, जबकि वित्त, पथ, ऊर्जा और परिवहन विभाग के निदेशकों के नाम मांगे गये हैं. 
 
एमडी की नियुक्ति राज्य सरकार करेगी. बतौर कंपनी अधिसूचित होते ही कॉरपोरेशन अंतरिम कंसलटेंट, डिटेल डिजाइन कंसल्टेंट व जनरल कंसल्टेंट की नियुक्ति के साथ ही भू-अर्जन संबंधित मुद्दों पर काम शुरू कर देगा. केंद्र की मंजूरी के बाद मेट्रो रेल  पॉलिसी  2017 के अनुसार ज्वाइंट  एसपीवी का गठन होगा, जिसमें चेयरमैन  भारत सरकार के  जबकि एमडी बिहार  सरकार के नॉमिनी होंगे. पांच नये केंद्रीय निदेशक भी  जुड़ेंगे.
 
पांच रूटों पर अनुशंसा     
 
डीपीआर तैयार करने वाली कंपनी राइट्स ने शहर में पांच रूटों पर मेट्रो चलाने की अनुशंसा की है, जिसमें से दो रूट की डिटेल रिपोर्ट बनायी गयी है. 
 
इन्हीं दो रूटों इस्ट-वेस्ट कॉरिडोर और नॉर्थ साउथ कॉरिडोर पर पहले चरण में काम शुरू होगा. दोनों  कॉरिडोर की कुल लंबाई 31.39 किमी होगी, जिसमें कुल 24 मेट्रो स्टेशन होंगे. इसमें 15.38 किमी का भाग एलिवेटेड यानि सड़क के ऊपर जबकि 15.75 किमी भाग अंडरग्राउंड यानि सड़क के नीचे रहेगा. 12 मेट्रो स्टेशन एलिवेटेड और 11 स्टेशन अंडरग्राउंड जबकि एक सड़क के बराबर आयेंगे.
 
अब तक का सफर        
 
- 18 जून 2013 को संकल्प निर्गत  - 11 नवंबर 2013 तक नागरिकों से मांगे सुझाव  - राशि इकट्ठा करने को 28 जनवरी 2015 को इन्वेस्टर मीट - नौ फरवरी 2016 को राज्य कैबिनेट की मंजूरी  - मार्च 2016 में डीपीआर मंजूरी के लिए केंद्र को भेजी गयी  - अगस्त 2017 में नयी मेट्रो पॉलिसी लांच, प्रस्ताव वापस - अक्तूबर 2017 में एनआईटी-राइट्स को मिली संशोधित डीपीआर तैयार करने की जिम्मेवारी  - मई 2018 में राइट्स ने संशोधित डीपीआर नगर विकास एवं आवास विभाग को सौंपा  - जून 2018 में लोहिया पथ चक्र की वजह से बेली रोड पर मेट्रो का पुन: डिजाइन बदला  - सितंबर 2018 में आवश्यक संशोधन कर डीपीआर विभाग को समर्पित - 09 अक्तूबर 2018 को कैबिनेट से संशोधित मेट्रो प्रस्ताव को मंजूरी.

Friday, September 28, 2018

जानकारी व आपके स्वास्थ्य और कैरियर संबंधी सलाह।

आप का दिन अनुकूल रहेगा। आप तन-मन से स्वस्थ होकर कार्य कर पाएंगे, जिससे कार्य में उत्साह एवं उर्जा अनुभव करेंगे। रोमांसः परिवारजनों के साथ आनंद एवं उल्लास से समय बीतेगा। करियरः  आर्थिक लाभ होगा। कार्यालय में कर्मी सहयोग करेंगे।
आज होने वाली घटनाओं से आप चिंतित रहेंगें। स्वास्थ्य खराब होने और आंखो में कष्ट होने की संभावना है। रोमांसः जीवनसाथी संग किसी मनमोहक स्थान पर जाने का कार्यक्रम बन सकता है। करियरः  खर्च अपेक्षा से अधिक होगा और घोर परिश्रम के बाद ही सफलता मिलेगी।
आज अनेक रूप से लाभ होने के कारण आपके हर्षोल्लास में दोगुनी वृद्धि होगी। रोमांसः मित्रों से हुई मुलाकात से आनंद मिलेगा। विवाहोत्सुकों को योग्य जीवनसाथी मिल सकता है। करियरः  व्यवसाय में लाभ होगा। आर्थिक तौर पर खुद को सशक्त महसूस करेंगे।
आज का दिन आप के व्यवसाय के लिए लाभदायी है।  दिन के कार्यभार से कुछ थकान का अनुभव होगा। रोमांसः प्रेमीजनों के लिए आज का दिन आनंदमयी रहेगा। गृहस्थजीवन आनंदपूर्ण बीतेगा। करियरः  पदोन्नति की पूरी संभावना है। धन संपत्ति, मान सम्मान के अधिकारी बनेंगे।
आज का दिन धार्मिक प्रवृत्तियों में व्यतीत करेगें एवं स्नेहीजनों के साथ किसी धार्मिक स्थल पर जाने का सुनहरा अवसर है। रोमांसः पार्टनर संग कहीं घूमने जा सकते हैं। करियरः  व्यवसाय में बाधा उपस्थित होने की संभावना है व पदाधिकारियों की अप्रसन्नता के कारण दुखी होने की संभावना भी है।
आज वाणी संयम रखने का सूचन करते हुए यह कहते हैं कि आज किसी नए कार्य का प्रारंभ न करें और क्रोध एवं आवेश में वृद्धि न आए इसका ध्यान रखें। रोमांसः जीवनसाथी संग किसी बात पर मनमुटाव हो सकता है। करियरः  व्यवसाय में लाभ-हानि दोनो ही देखने को मिल सकते हैं।
आज मनोरंजन साधनों एवं वस्त्रालंकारों की खरीदी का योग है। रोमांसः आज का दिन में आप का मन मित्रों व स्नेहीजनों के साथ खान-पान, सैर-सपाटे एवं प्रेम संबंधों की वजह से प्रफुल्लित रहेगा। यात्रा पर्यटन के योग हैं। करियरः  कार्यालय में आपके काम की प्रशंसा होगी।
आज आप के घर में सुखशांति और आनंद का माहौल रहेगा। आपका शारीरिक एवं मानसिक आरोग्य अच्छा रहेगा। रोमांसः स्त्री मित्रों से मुलाकात होगी। करियरः  धन जरूरी वस्तुओं पर ही खर्च होगा। प्रतिस्पर्धीयों तथा शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी।  धन लाभ होगा।
आज आपको यात्रा-प्रवास न करने की गणेशजी सलाह देते हैं। रोमांसः प्रणय संबंधों के लिए आज का दिन योग्य है। प्रियपात्र के साथ रोमांचक पल का आनंद ले पाएंगे। करियरः  आज साहित्य एवं कला में आपकी रुचि रहेगी और मन में कल्पना की तरंगे उठेंगी। चर्चाओं से दूर रहें।
आज आपकी मनःस्थिति और स्वास्थ्य कुछ अच्छे नहीं है। रोमांसः प्रेमी-प्रेमिका के बीच कुछ अनबन हो सकती है। क्रोध पर काबू रखें। करियरः  मानहानि होने की संभावना है।  मानसिक आवेग और प्रतिकूलताओं में वृद्धि से आपका दिन व्यग्रतापूर्ण बीतेगा।
मानसिक रुप से आज आप बहुत हल्कापन महसूस करेंगे। आपके मन पर छाए हुए चिंता के बादल हटने से आपके उत्साह में वृद्धि होगी। रोमांसः महिला मित्रों से मुलाकात होगी, कहीं घूमने का कार्यक्रम भी बन सकता है। करियरः  प्रतिस्पर्धियों पर विजय प्राप्त होगी।
आज आप को व्यय पर संयम रखने की सलाह देते हैं। क्रोध  पर संयम रखें, अन्यथा इससे मानसिक दुख पहुंचने की संभावना है। रोमांसः जीवनसाथी का हर संभव सहयोग प्राप्त होगा। करियरः  कार्यालय परिसर में सहयोगियों का सहयोग मिलेगा। आर्थिक लाभ होगा।

Friday, September 14, 2018

कोर्ट को कानून में इस तरह का बदलाव करने का

म इंडिया के कप्तान विराट कोहली और बॉलीवुड एक्ट्रेस अनुष्का शर्मा को लेकर फैन्स के बीच खूब क्रेज रहता है। भारतीय क्रिकेट टीम इंग्लैंड में टेस्ट सीरीज खत्म होने के बाद लंदन से भारत के लिए रवाना हुई। इस दौरान विराट कोहली ने जो टी-शर्ट पहन रखी थी, वो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है।
दरअसल विराट की इस सफेद टी-शर्ट पर रेड कलर का हार्ट बना है और उसके नीचे A लिखा है। इसके पहले एक बार अनुष्का को विराट के नाम और जर्सी नंबर की टी-शर्ट पहने हुए भी देखा गया है। विराट की ये टी-शर्ट देखने के बाद लोग अनुष्का शर्मा को लकी कह रहे हैं। भारत को इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट सीरीज में 1-4 से हार का सामना करना पड़ा।
विराट फिलहाल अब क्रिकेट से ब्रेक पर होंगे और वो एशिया कप में टीम का हिस्सा नहीं हैं। विराट लंबे समय से लगातार क्रिकेट खेल रहे हैं और भारतीय क्रिकेट टीम के आने वाले शेड्यूल को देखते हुए आराम दिया गया है।
हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह समेत कई राजनीतिक हस्तियों ने शुभकामनाएं दी। इस मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट कर कहा कि भाषा वह माध्यम है जिससे कोई भी समाज अपना ज्ञान, संस्कृति और संस्कार भावी पीढ़ियों तक पहुंचाता है। उन्होंने आगे कहा कि हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में लगे भाषाविदों और हिंदी प्रेमियों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।
हिन्दी दिवस के मौके पर कई कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया और उसके महत्व पर जोर देते हुए इसके मूल स्वरूप को बनाए रखने पर ध्यान खींचा गया।
भारतीय दंड संहिता (आपीसी) की धारा 498ए के तहत दहेज प्रताड़ना केस में सर्वोच्च अदालत ने शुक्रवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में गिरफ्तारी हो या नहीं ये तय करने का अधिकार पुलिस को वापस दे दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर राज्य के डीजीपी को इस मुद्दे पर पुलिस अफसरों व कर्मियों में जागरुकता फैलाएं और उन्हें बताया जाए कि सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी को लेकर जो सिद्धान्त दिया है वो क्या है।

इसके साथ ही, गिरफ्तारी से पहले दहेज प्रताड़ना की जांच के लिए सिविल सोसायटी की कमेटी बनाने की गाइडलाइन को हटाया गया। लेकिन शीर्ष अदालत ने कहा कि पति और उसके रिश्तेदारों के सरंक्षण करने के लिए जमानत के रूप में अदालत के पास अधिकार मौजूद है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोर्ट इस तरह आपराधिक मामले की जांच के लिए सिविल कमेटी नियुक्त नहीं कर सकता, इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट के दो सदस्यीय बेंच के फैसले को संशोधित करते हुए तीन सदस्यी बेंच ने कहा कि इस तरह कोर्ट कानून की खामियों को नहीं भर सकता। ये कार्यपालिका द्वारा कानून लाकर ही करना संभव है। शीर्ष अदालत ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। सर्वोच्च अदालत ने दोहराया कि अगर दोनों पक्षों में समझौता होता है तो कानून के मुताबिक वो हाईकोर्ट जा सकते हैं। अगर पति पक्ष कोर्ट में अग्रिम जमानत अर्जी दाखिल करता है तो केस की उसी दिन सुनवाई की जा सकती है।
इससे पहले, इसी साल अप्रैल माह में सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। 2017 में इस मामले में चली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने आदेश दिया था कि दहेज उत्पीड़न की शिकायतों पर तुरंत गिरफ्तारी न हो और ऐसे मामलों को देखने के लिए हर ज़िले में फैमिली वेलफेयर कमिटी बनाया जाए। साथ ही, उसकी रिपोर्ट के आधार पर ही गिरफ्तारी जैसी कार्रवाई हो। दो जजों की बेंच के आदेश को ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
याचिका दायर कर कहा गया कि कोर्ट को कानून में इस तरह का बदलाव करने का हक नहीं है। कानून का मकसद महिलाओं को इंसाफ दिलाना है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के चलते देश भर में दहेज उत्पीड़न के मामलों में गिरफ्तारी बंद हो गई।ससे पहले, जुलाई 2017 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस यूयू ललित की दो जजों की बेंच ने महिलाओं के लिए बने कानूनों के दुरुपयोग के मामले को लेकर अहम निर्देश जारी किए थे। अपने आदेस में कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न कानून के दुरुपयोग की शिकायतों को देखते हुए ऐसे मामलों में तत्काल गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी थी। इसके अनुसार दहेज प्रताड़ना के मामलों में अब पति या ससुराल वालों की तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी। दहेज प्रताड़ना यानी आईपीसी की धारा 498-ए के दुरुपयोग से चिंतित सुप्रीम कोर्ट ने अहम कदम उठाते हुए इस सिलसिले में कुछ दिशा-निर्देश जारी भी किए थे।
दहेज कानून के दुरूपयोग के कई मामले आए सामने
एनसीआरबी के रिकॉर्ड के मुताबिक, साल 2009 के दौरान करीब 1 लाख 74 हजार लोगों की गिरफ्तारी 498ए के अंतर्गत हुई थी और इनमें 8,352 केस फर्जी साबित हुए। 2012 में 498ए के तहत केस दर्ज करने का रेट 93.6फीसदी रहा जबकि इसमें सिर्फ 14.3 फीसदी ही दोषी ठहराए गए थे।

Monday, September 10, 2018

होता था जब आपका अगला पैर ज़मी

"हमारी नज़र स्टेज की तरफ़ होती थी और हमें एकदम लय में क़दम आगे पीछे रखने होते थे. इसके साथ हमारे हाथ में मशालें होती थीं, वो भी एकदम सही लाइन में होनी चाहिए थीं."
इतनी परफेक्ट मार्च के लिए ही महीनों रिहर्सल कराई जाती थी.
"सबको पिछला पैर ठीक उस वक़्त उठाना होता था जब आपका अगला पैर ज़मीन पर पड़ गया हो. ये करना बहुत मुश्किल था. इसकी छह महीने तक रिहर्सल करते-करते लगों का वज़न कम से कम पांच किलो तक कम हो जाता था."
आयोजकों पर परफेक्शन का दबाव होता था. जिसका मार्च सबसे अच्छा होता था उसे मेडल मिलते थे और जिसका ख़राब हो जाता था उसे बुरी तरह डांटा जाता था. ही-चांग सत्ताधारी वर्कर्स पार्टी के सचिव थे. वो राजनीतिक कारणों के चलते चार साल पहले उत्तर कोरिया से भाग गए थे. उनका काम परेड के लिए देश के सबसे वफ़ादार परिवारों को चुनना होता था.
उस वक्त को याद करते हुए नो ही- चांग कहते हैं, "वो बहुत ही दर्दनाक अनुभव था. आम लोगों के साथ-साथ पार्टी के अधिकारियों को भी प्रताड़ना झेलनी होती थी, क्योंकि हमें परेड की शुरू से आख़िर तक सफलता की गारंटी देनी होती थी."
"मार्च के लिए सैन्य अकादमियों और प्रमुख सैन्य इकाइयों से भी लोगों को चुना जाता था. इसके अलावा गायकों, डांसरों और जिमनास्टों का भी चुनाव होता था. इन सब को चुनने का सिर्फ़ एक ही आधार था कि सब लोग किम परिवार के प्रति वफ़ादार हों."
नो बताते हैं, "हर व्यक्ति के बारे में पहले अच्छे से पता करना होता था. सबसे अहम ये देखना होता था कि उनके परिवार का क्या रिकॉर्ड रहा है. उनके परिवार का रिकॉर्ड साफ़-सुथरा होना ज़रूरी था, वो देश के प्रति वफ़ादार होने चाहिेए थे."
उत्तर कोरिया से भागे कई लोगों ने बताया कि उन्हें परेड के लिए कई महीनों तक रोज़ाना 10-10 घंटे की ट्रेनिंग कराई जाती थी.
कुछ लोग बीमार हो जाते थे, कुछ को चोटें आती थीं और किसी की हालत परेड में हिस्सा लेने लायक नहीं बचती थी, तो उसका रिप्लेसमेंट भी ढूंढ़ना होता था.
लेकिन वो नेता ये सब कैसे कर सकता है जिसने उत्तर कोरिया के लोगों की ज़िंदगी को बेहतर बनाने का वादा किया हो? किम जोंग-उन उत्तर कोरिया को परमाणु संपन्न देश घोषित कर चुके हैं और कह चुके हैं कि उनका मक़सद देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ाना है.
उत्तर कोरिया की सरकारी मीडिया ने भी रविवार को होने वाली परेड को "जीत का जश्न और देश की अर्थव्यवस्था के तेज़ी से होते विकास को दर्शाने वाला" क़रार दिया है.
लेकिन माना जा रहा है कि स्थापना दिवस के ख़ास मौके पर किम जोंग-उन बड़ी और अहम घोषणा कर सकते हैं. कई विश्लेषकों का मानना है कि वो ऐसी उपलब्धि चाहते हैं जो उनके पिता और दादा भी हासिल नहीं कर पाए- वो कोरिया के युद्ध की समाप्ति की घोषणा करना चाहते हैं.
ये युद्ध एक सैन्य समझौते के बाद 1953 में ख़त्म हो गया था. लेकिन कभी कोई शांति समझौता नहीं हुआ. मरीका के साथ बातचीत अटकने के बाद किम जों-उन ने इस हफ्ते दक्षिण कोरिया के प्रतिनिधिमंडल का अपने देश में स्वागत किया और कोरियाई प्रायद्वीप को "परमाणु-मुक्त कराने की अपनी प्रतिबद्धता" को दोहराया.
दक्षिण कोरिया के अधिकारियों के मुताबिक किम इस बात से परेशान है कि उनकी सकारात्मक कोशिशों पर दुनिया भरोसा नहीं कर रही है.
वो अमरीका के साथ रिश्ते बेहतर करने की इच्छा जता चुके हैं. वो जानते हैं कि ऐसा करने के लिए परमाणु निरस्त्रीकरण पहली शर्त है.
किम ट्रंप के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं, ट्रंप भी ट्वीट कर जवाब दे चुके हैं कि "वो साथ मिलकर ये करने को तैयार हैं."
हालांकि इन कोशिशों की राह में अब भी एक बड़ा रोड़ा है. किम जोंग-उन उत्तर कोरिया के अबतक के सबसे खुले विचारों के नेता तो दिखना चाहते हैं, लेकिन वो दुनिया को अब भी उत्तर कोरिया का एक सीमित रूप ही दिखाना चाहते हैं. और विदेशी मीडिया को परेड के लिए आमंत्रित करना एक ऐसा ही क़दम है.
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक उत्तर कोरिया की क़रीब 40 फ़ीसदी यानी एक करोड़ से ज़्यादा आबादी को मानवीय सहायता की ज़रूरत है. देश के करीब 20 फ़ीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं.
कोरियाई प्रायद्वीप के लिए ये साल सबसे गर्म रहा. उत्तर कोरिया के सरकारी मीडिया के मुताबिक इस साल "अभूतपूर्व प्राकृतिक आपदा" आई है.
रेड क्रॉस सोसायटी ने भी चेतावनी दी है कि चावल, मक्का और दूसरी फसलें सूख चुकी हैं, जिससे "भीषण खाद्य सुरक्षा संकट" का ख़तरा खड़ा हो गया है.
अगस्त में आंधी के साथ आई बाढ़ की चपेट में आने से कम से कम 76 लोगों की मौत हुई थी और क़रीब इतनी ही संख्या में लोग लापता हुए जबकि हज़ारों लोग बेघर हो गए थे.
ये उम्मीद कम ही है कि विदेशी मीडिया को तबाही का ये मंज़र दिखाया जाएगा. बल्कि किम और ट्रंप की हाल ही में हुई हाई-प्रोफाइन समिट के बावजूद मीडिया पर कड़ा नियंत्रण रखा जाएगा.
नो ही-चांग याद करते हैं कि भीषण गर्मी में मार्च कराई जाती थी और लोग लगभग भूखे पेट मार्च करते थे.
"ओह वो भूख. भूखा रहना सबसे बड़ी बात थी. ख़ासकर किम जोंग-इल के ज़माने में तो खाना बहुत ही कम था. सभी एक लाख लोग सुबह से रात तक काम करते थे. उनके लिए सबसे बड़ी परेशानी दो वक़्त की रोटी मिल पाना था."
फिर भी जब नो ही-चांग से पूछा गया कि एक मैनेजर के तौर पर क्या वो परेड में शामिल उन लोगों से माफ़ी मांगने चाहेंगे. तो उन्होंने बड़े ही सख़्त लहज़े में ना कह दिया.उत्तर कोरिया में हमें सिखाया जाता था कि अगर दीवार हिलती है तो पहाड़ को भी हिलना ही होगा. इसका मतलब कि अगर किम इल-सुंग या किम जोंग-इल 'आह' कहते हैं तो हर नागरिक को 'आह' कहना है. वहां लोगों को सिर्फ़ "जी सर" कहना आता है. वहां सिस्टम इसी तरह काम करता है."
इस वफ़ादारी और गर्व की भावना को ही परेड और देश की सफलता की वजह समझा जाता है. किम जी-योंग याद करते हैं कि जब उनके दोस्त और सैनिक अपने नेता के सामने से गुज़रते थे तो ज़ोर से "लॉन्ग लिव" का नारा लगाते थे.
"उन्हें ये इतनी तेज़ चिल्लाकर बोलना होता था कि 100 मीटर लंबी मार्च के आख़िर तक ये आवाज़ पहुंचे. हमने उनसे बात करने की कोशिश की लेकिन अब वो अपनी आवाज़ खो चुके हैं."
एक दर्शक होने के नाते किम कहते हैं कि ऐसे देश में सर्वाइव करने के लिए भी तो यही एक तरीका है.
"हम सब पार्टी के बड़े-छोटे अधिकारियों के बच्चे थे. अगर हम में से कोई शिकायत कर देता तो उसे ग़ायब कर दिया जाता था. इसलिए वहां कोई शिकायत नहीं करता."
"विदेशियों को ये परेड खूब पसंद आएगी, लेकिन मैं उन्हें बताया चाहता हूं कि परेड में शामिल होने वाले वो लोग बिना कुछ खाए छह महीने तक मेहनत करते रहे हैं. उन्होंने छह महीने तक इतना पसीना क्यों बहाया - सिर्फ़ 10 मिनट की मार्च के लिए? ये दिल को तोड़ने वाला है. मैं चाहता हूं लोग ख़ासकर पत्रकार उत्तर कोरिया के उस रूप को देखें जो कहीं दबा-छिपा है."
लेकिन इतनी मुसीबतें झेलने के बाद भी लोगों के मन में देशभक्ति की भवना है.
नो कहते हैं कि अगर उन्हें मौका मिलेगा तो वो उत्तर कोरिया लौटना चाहेंगे.
"100% मैं वापस जाऊंगा. अपने शहर के बारे में सोचकर मुझे रोना आता है. बिल्कुल, मैं खुशी से वापस जाना चाहूंगा. मैं हमेशा से प्योंगयांग वापस जाना चाहता हूं. कौन अपने वतन वापस नहीं लौटना चाहेगा?"

Tuesday, September 4, 2018

气候峰会:德班继续僵持

候变化会场外活动人员努力唱歌跳舞,希望推动政府达成全球协议抗击全球变暖
周四,尽管重要参会者——美国、欧盟和“基础四国”即中国、印度、巴西和南非之间已进行多次三边会议,但寻求应对气候变化全球协定的努力仍处于僵持状态。此时,距南非德班举行的联合国气候峰会闭幕还剩一天时间。印度环境部长贾彦什•纳塔拉简表示,前天她就已经“不再像以前那么乐观”。她也将返程机票从周六改到了周日。
 
今年“联合国气候变化框架公约”会议上的问题是,以“基础四国”为首的发展中国家希望富裕国家在2012年以后继续按现行《京都议定书》的规定进行温室气体( )减排,而发达国家则提出条件——新兴经济体国家也签订具有法律效力的协议来执行减排。“大家讨论的焦点是如何达成一致。对此,我没什么信心”,纳塔拉简女士说。“关键问题很明确。这也是我们忧心忡忡之处。”
 
周三美国、欧盟和“基础四国”之间的三方会谈进行了5个小时,截止周四下午又进行了2个小时。但是,对于这个困扰气候峰会多年的关键问题,依然没有任何解决方案。纳塔拉简女士说,她也见过来自77国集团的其他发展中国家代表,“他们和我们的立场一样”。尽管她承认,小岛国家联盟( )要求重要与会国采取其不愿接受的更为直接的行动。
 
来自“基础四国”的四位部长每天会面了三、四次。周四早上,他们一起去见了大会主席南非外交部长恩科阿纳-玛莎巴尼。“我们也告诉了她我们的观点,她表示会认真考虑,” 纳塔拉简女士说。
 
印度和其他发展中国家始终坚持,富裕国家应该按《京都议定书》第二个承诺期履行承诺。《京都议定书》是温室气体减排方面唯一具有法律效力的协议,第一个承诺期在2012年结束。美国没有签订此协议,其他富裕国家始终在抵制这一协议。现在,纳塔拉简女士说,“欧盟愿意履行它的第二个承诺期,但是非常希望制定一个路线图”,将新兴经济体也框入有法律效力的承诺中。“过去我们很明确。现在我们需要知道这个路线图的内容和时间安排。过去,我们都愿等看到IPCC评估报告再作决定。”下一次政府间气候变化小组( )评估报告将于2013年发布,随后2013至2015年间为审查期。
 
在周四的会议上,与会的美国代表团团长托德•斯特恩非常愤怒,因为很多人认为美国阻碍了达成协议的进程,而全球变暖已经在影响世界农业产出,使洪水、风暴和干旱更加频繁和严重,并导致海平面的上升。通过三方会谈,有一点已经明朗:美国与欧盟在具有法律效力协议的等级方面存在差别——欧盟认为,发展中国家可以少减排一些,因为现在几乎大气中所有多余的温室气体都是富裕国家排放的;但美国则坚持“完全对等”的减排标准。当问及此问题时,纳塔拉简女士说,“对此我们并不担心。我们已经重申过我们的议程。”
 
但是,观察者可以感觉出,只要富裕国家愿意为绿色气候基金注资,德班会议仍然可能会有一些成果。其中,绿色气候基金是为帮助贫困国家应对气候变化影响而成立的组织。但是,就像纳塔拉简女士所说,这是“一项艰巨的任务”,这就是为什么她“不再”那么乐观的原因。
 

Thursday, August 30, 2018

制定气候变化协议,中国的作用为何愈加重要?

国领导人本周在纽约举行会晤,希望打破气候变化问题的政治僵局,为即将于2015年召开的巴黎气候大会造势。将全球平均温度上升幅度控制在与工业革命之前相比不超过2℃这一目标,已经是全球领导人的共识。但是当前的气候政策还不足以实现该目标。

我们本周发表的一项研究揭示了一个新的动态发展趋势——即在快速大规模的经济发展背景之下,全球碳排放量版图因中国而改变。

目前,中国的二氧化碳排放量几乎占全球二氧化碳排放总量的三分之一(30%),比美国和欧盟的总和还多。2013年,中国人均二氧化碳排放量超过欧洲,比全球人均排放值高45%。

2013年,全球化石燃料燃烧和水泥生产排放的二氧化碳较前一年增长了2.3%,预计到2014年还将上涨2.5%。若将森林砍伐考虑在内,2014年全球二氧化碳排放量可能超过400亿吨。尽管过去25年中举行了多次气候磋商,如今的温室气体排放量却几乎比1990年时高出65%。

中国的温室气体排放占2013年全球新增排放量的50%以上,在过去十年全球新增排放量中的占比达到60%以上。

不论人们如何解读数据,想要将全球平均温度上升控制在2℃以内,中国才是关键。尽管中国投入巨资发展可再生能源技术,全力引入排放交易体系,出台各项措施解决大气污染,但温室气体排放量依然继续上升;若想将全球平均温度上升限制在2℃以内,中国的排放量必须达到峰值并快速回落。

煤炭在中国能源消费结构中仍占有最大比重。2013年中国温室气体排放量比前一年增长了4.2%;但低于过去十年7.1%的年平均排放增长率,这得益于近年中国经济活动放缓。

我们的碳预算数据显示,中国在碳排放地缘政治中的地位已经改变。中国若能坚定不移地采取强有力的减排行动,这将向全世界发出有力的信号,全球平均温度上升控制在2℃以内的目标也是可以实现的;到那时,不论是发达国家,还是发展中国家就都没有理由再裹足不前了。


戈兰•彼得斯,挪威奥斯陆国际气候和环境研究中心()高级研究员,《2014年全球碳预算》作者,全球碳计划科学指导委员会成员。与哥本哈根会议前相比,世界各国在发展低碳经济方面积累了更多的经验。例如,5年前,可再生能源的开发利用还停留在可行性研究阶段。如今,这一情况发生了根本性的转变,可再生资源的开发利用发展迅速。目前,太阳能制造成本已经下跌了80%,风电价格也达到历史最低水平。中国为2015年、2017年和2020年的可再生能源发展制定了雄心勃勃地目标。同时,越来越多的美国公用事业公司发现,利用风能和太阳能是扩大发电能力最经济的方式。将近100多个发展中国家已经制定并实施了可再生能源政策。与此同时,约有40个国家政府和20多个地方级政府制定了碳排放价格,控制污染。

能源格局正在转变,低碳经济带来了明显的经济和社会效益。这表明,国家、企业和个人在制定政策,加快替代化石燃料方面获得了越来越多的经验和支持。这些变化,与经济复苏(与哥本哈根会议前摇摇欲坠的经济相比)一道促进了各国政府采取比之前相比更加雄心勃勃的气候行动。

此外,新型合作伙伴关系和新的观点也改变着气候变化的政治格局。包括智利、印尼、越南和哥斯达黎加在内的一些中等收入国家也站出来呼吁走全新的低碳发展之路。这些新角色将在巴黎气候会谈(即将于2015年12月举行)之前的谈判中发挥主导作用。

白韫雯——北京创绿中心气候与政策研究员

2009年以来,我感到双边合作明显增多。之前各个国家大都在联合国气候变化框架公约和京都议定书下履责,而在哥本哈根之后双边合作明显增多,如中美气候变化联合声明、中英气候变化联合声明,中俄联合声明中也同样涉及到“双方坚定遵循《联合国气候变化框架公约》的原则和宗旨,愿为加强国际合作、共同应对全球气候变化挑战作出贡献”。

在2008年之前欧盟具有谈判的动力,而往后中美欧都开始承担相应的责任。主要体现在美国从在京都议定书中的被动局面开始逐渐发力,中国也开始重视气候谈判。

责任的区分也开始细化,新兴经济体如中国、印度、巴西被从发展中国家中区别开来,按照其经济体量、温室气体排放量等承担义务。

王彬彬——乐施会气候变化与减贫团队经理

2009年哥本哈根气候大会强调(气候变化)减缓,气候变化适应的问题没有得到足够重视。中国政府缺乏经验,只是被动且没有意识的接受减缓,忽视了气候变化对贫困人口的影响。

2011年德班气候大会时,减缓和适应被提出应摆在同等重要的位置。中国政府也把适应问题作为国家战略考虑。

但是适应存在难以量化的困难,到目前为止技术层面如何进行仍然不是很清晰。

在资金问题上,尽管发达国家就各自提供资金始终语焉不详,设立的绿色气候基金至今还是空头支票,但发展中国家开始将关注点从发达国家提供的资金数量转移到如何获得_更多资金来源,以及资金如何进行管理、分配和落实上。中国同样在推进适应基金的工作。

蒋南青,联合国环境规划署中国办公室

从哥本哈根之后,欧盟就已经制定了严格的目标,并且在减排工作上表现积极。中国政府一方面会受到欧盟等国际社会的压力,另一方面国内的环境问题也迫切需要开始采取行动。在共同但有区别的责任原则下,可以看到中国政府正在将气候谈判的目标分解细化,从建设部、工信部,到交通业,各个行业都开始根据这一宏观目标制定相应任务,比如建立碳交易市场。由此可以看出在09年谈判后,中国政府已经开始逐渐采取实际行动,承担自己的责任义务。

法特玛·拉贾巴利,发展研究所

哥本哈根会议后,非洲具有实证依据的气候变化政策和行动获得了很大的进展,新的区域联盟、倡议以及学习活动层出不穷。但农业发展面临的挑战日益清晰: 政府间气候变化专门委员会(IPCC)发布的最新报告着重阐述了气候变化是如何影响农业生产和粮食安全,并进一步加剧了本就堪忧的全球饥饿和营养不良状况。

非洲有占劳动力总数65%的人口从事农业生产,农业生产总值占GDP总量的30-40%。令人不安的是,目前整个非洲还未就如何应对气候变化的影响达成一致协议。

即将成立的全球气候智能型农业联盟、以及近期召开的首届聚焦农业发展的美非峰会和以“非洲自给自足的时刻已经到来”为主题的气候发展大会都推动了非洲地区应对气候变化的进程。非洲政府仍需要仔细思考如何尽可能地确保这一进程取得成效。

首先,包括东部和南部非洲共同市场( ) 和非洲发展新伙伴计划( )在内的非洲区域性机构需要对“气候智能型农业”的理解达成共识——即气候智能型农业旨在提高粮食产业安全和抵御灾害的能力,同时减少温室气体排放。鉴于农业发展面临的挑战涉及到多个部门,跨境影响也在逐渐增加,因此,各国之间以及国内各部门之间还应展开密切合作。目前应该尽可能地让决策者获得有关气候智能型农业的现有证据,同时还需要仔细分析气候智能型农业对整个社会(包括公共卫生和营养、以及贸易和技术等方面)的影响。

相比于各国领导人出席某一峰会,人类不断适应气候变化的进程更加重要。非洲各国政府和区域机构必须行动起来,共同应对气候变化。

希娜·洛提亚,国际环境与发展学院(LEAD)巴基斯坦项目

在我看来,过去几年,谈判进行得很艰难,温室气体排放国也曾承诺提供大量资金和专业技术支持减排。然而,一要落实到实际行动中时,根深蒂固的政治经济便开始占据主导,一切承诺就自然而然地被抛之脑后了。

除了官方发展援助外,发达国家承诺在2010-2012年间向易受灾国家,尤其是最不发达国家,提供300亿美元的资金支持。发达国家还承诺到2020年之前,每年向包括巴基斯坦在内的发展中国家提供1000亿美元的长期气候融资。这笔资金能否落实还是个未知数,而且款项支出机制的透明度也存在问题。

巴基斯坦温室气体排放量较低,它可能并不关注这些问题。但是我发现,这些年来,由于许多新兴经济体选择加入美国的行列,《京都议定书》(KP)的影响力大大下降。美国一直以来坚决拒绝签署《京都议定书》,并拒绝承诺减少温室气体的排放。

虽然这些年来,有关“适应气候变化”的对话一直不断,但是目前,“损失与破坏”成为人们关注的另一焦点,这对巴基斯坦来说意义重大。试想,假如各国采取了适应性措施,但是由于气候变化缓慢,这些国家还是要继续遭受海水入侵和荒漠化等灾害的影响,会发生什么?我们知道如何评估和计算由此造成的损失吗?

Tuesday, August 28, 2018

होटल विवाद मामले में मेजर गोगोई दोषी क़रार, होगी कार्रवाई

भारतीय सेना की कोर्ट ऑफ़ इन्क्वॉयरी (CoI) में मेजर लीतुल गोगोई के ख़िलाफ़ होटल विवाद मामले में दोषी पाया गया है और उनके ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई का आदेश दिया गया है.
अदालत ने पहली नज़र में मेजर गोगोई को स्थानीय लोगों के साथ 'सेना के निर्देशों के ख़िलाफ़ जाकर मेलजोल और अनौपचारिक सम्बन्ध रखने और ड्यूटी की जगह से दूर रहने' का दोषी पाया है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक कोर्ट ऑफ़ इन्क्वॉयरी सेना के ही एक ब्रिगेडियर ने की है.
ये सारा विवाद तब शुरू हुआ जब मेजर गोगोई ने इस साल मई में एक स्थानीय युवक और 18 साल की एक लड़की के साथ श्रीनगर के एक होटल रूम में जाने की कोशिश की.
होटल स्टाफ़ ने लड़की को कमरे में जाने की इजाज़त नहीं दी, जिसकी वजह से स्टाफ़ के सदस्यों और कुछ स्थानीय लोगों से उनका झगड़ा हुआ था.
इसके बाद पुलिस ने मेजर गोगोई को हिरासत में ले लिया था.
विवाद बढ़ने और मामला मीडिया में आने के बाद सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने कहा था कि अगर मेजर गोगोई दोषी पाए गए तो उन्हें ऐसी सज़ा मिलेगी जो मिसाल बनेगी.
अब कॉर्प्स कमांडर को बाद कोर्ट ऑफ़ इन्क्वॉयरी के फ़ैसले को मंजूरी देनी होगी, जिसके बाद आर्मी ऐक्ट की प्रासंगिक धारा के तहत मेजर गोगोई पर आरोप तय किए जाएंगे.
फिर ये फ़ैसला होगा कि उन्हें सज़ा दी जाएगी या उनका कोर्ट मार्शल किया जाएगा.
मेजर गोगोई पिछले साल तब चर्चा में आए थे जब उन्होंने बडगाम में एक शख़्स को मानव ढाल के रूप में सेना की जीप से बांध दिया था.
इसके बाद उन्हें सेना ने पुरस्कार भी दिया था. इस पूरे मामले पर काफ़ी विवाद हुआ था और अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिली.
जम्मू-कश्मीर पुलिस ने इस मामले में भारतीय सेना की 53वीं राष्ट्रीय रायफल्स के ख़िलाफ एफ़आईआर भी दर्ज की थी.
पिछले हफ़्ते दो अभूतपूर्व घटनाएँ हुईं जिन्हें आप चाहें तो 'मामूली बात' कहकर ख़ारिज कर सकते हैं, या फिर अगर बारीकी से देखें तो ये घटनाएँ आपको चिंतित कर सकती हैं.
हाल ही में पटना हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किए गए जस्टिस मुकेश रसिक भाई शाह ने बीबीसी हिंदी को दिए एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री की तारीफ़ में कहा कि "नरेंद्र मोदी एक मॉडल हैं, वो एक हीरो हैं.
दूसरी घटना छत्तीसगढ़ की है जहाँ राज्य सरकार के जनसंपर्क विभाग ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की तस्वीरों वाली बड़ी बड़ी होर्डिंग्स रायपुर शहर में लगा दीं जिनमें मुख्य न्यायाधीश के तौर पर पहली बार छत्तीसगढ़ आने के लिए उनका स्वागत किया गया था.
हालाँकि, रिपोर्टों के मुताबिक़
भारत के किसी भी नागरिक को, चाहे वो न्यायाधीश ही क्यों न हो, किसी की तारीफ़ या आलोचना करने का संवैधानिक अधिकार है.
देश के नागरिक और वोटर की हैसियत से जज़ भी किसी न किसी राजनीतिक पार्टी के काम या विचारधारा से सहमत होकर उसे वोट देते हैं.
बाद में इनमें से कुछ होर्डिंग्स को उतार दिया गया था.
सतही तौर पर देखें तो दोनों घटनाएँ बेहद मामूली नज़र आएँगी.
जज होने के कारण उनका ये जनतांत्रिक अधिकार कम नहीं हो जाता.
लेकिन जब कोई जज न्याय की कुर्सी पर बैठा होता है तो कई बार उसे नागरिक के तौर पर अपनी पसंद के नेता, राजनीतिक पार्टी यहाँ तक कि सरकार के ख़िलाफ़ भी फ़ैसला करना पड़ सकता है.
इसीलिए हमारी शासकीय प्रणाली में न्यायपालिका को सरकारों से आज़ाद रखा गया है.
न्यायपालिका को सरकार का अंग इसीलिए नहीं माना जाता कि वो सरकार और उसके मुखिया के ख़िलाफ़ भी फ़ैसले करती है.
जनता की नज़रों में न्याय करने वाला सत्ता से ऊपर भले ही न हो पर आज़ाद ज़रूर होना चाहिए.
तभी न्याय की व्यवस्था में जनता का भरोसा बना रह सकता है.
जब तक ये भरोसा बना रहता है तब तक जनता न्याय की तलाश में पुलिस-प्रशासन और नौकरशाही के ज़रिए अदालत तक जाती है.
जहाँ ये भरोसा दरकने लगता है लोग अपने अपने तरीक़े और नज़रिए से ख़ुद ही "न्याय" करने लग जाते हैं.
दुनिया के कई देशों में इसी तरह से अराजकता फैली है और वहाँ अदालतें नहीं बल्कि विजिलांती संगठन, मिलिशिया और अपराधियों के गिरोह फ़ैसला करते हैं.
ज़्यादातर मामलों में दुश्मन के ख़िलाफ़ ये फ़ैसले सड़क पर ही किए जाते हैं.
ये बात जस्टिस मुकेश रसिक भाई शाह ही बेहतर जानते हैं कि जब वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को "हीरो और मॉडल" बता रहे थे तो क्या ये उन्होंने ये राय एक आम नागरिक की हैसियत से दी थी या पटना हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस के तौर पर.
और क्या उनकी राय में मोदी उनके अपने मॉडल और हीरो हैं या वो ये बात पूरे देश के लोगों की ओर से कह रहे थे?
जस्टिस शाह चाहते तो कह सकते थे कि लोगों की राय पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं है और सबको अपनी बात कहने का हक़ है.
लेकिन उन्होंने जवाब में मोदी के बारे में अपनी राय स्पष्ट शब्दों में प्रकट की और कहा, "क्योंकि नरेंद्र मोदी एक मॉडल हैं, वो एक हीरो हैं."
सरकारें क्यों नहीं चाहेंगी कि न्यायाधीश उनकी तरफ़दारी करें? सरकारें और सत्तारूढ़ पार्टियाँ क्यों नहीं चाहेंगी कि क़ानून के हाथ जब उनके किसी बड़े नेता तक पहुँचने वाले हों तभी कोई अदृश्य शक्ति इस हाथ को पीछे खींच ले?
सरकारें क्यों नहीं चाहेंगी कि उनके हर सफ़ेद-सियाह पर अदालतें अपनी मुहर लगाएँ ताकि उनको सबकुछ करने की छूट मिल जाए, जैसा कि इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गाँधी ने चाहा और करवाया?
सरकारें क्यों नहीं चाहेंगी कि देश के हर नागरिक की आँखों की पुतलियों की तस्वीरें, अँगुलियों के निशान, फ़ोन नंबर, बैंक खाते, मकान-दुकान, पत्नी-बच्चे, माता-पिता, चाचा-ताऊ-बिरादर और रिश्तेदारों की सब जानकारियाँ उसकी मुट्ठी में हो?
सरकारें ज़रूर जानना चाहेंगी कि आप क्या खाते हैं, कहाँ जाते हैं, किससे मिलते हैं, कौन से कपड़े पहनना पसंद करते हैं, इंटरनेट पर कितना समय और क्या देखने में बिताते हैं, किस पार्टी को अच्छा और किसे बुरा समझते हैं, ट्रेड यूनियन को नेतागिरी मानकर ख़ारिज करते हैं या इसे कामगारों का बुनियादी अधिकार मानते हैं.
सरकारों की ऐसी ही कई असंवैधानिक मनमानियों पर अंकुश लगाने का काम न्यायाधीशों का है. पर अगर न्यायाधीश सरकार चलाने वालों को "हीरो और मॉडल" कहने लगे तो इसे उनकी सहानुभूतियों के संकेत की तरह देखा जा सकता है और न्याय की कुरसी पर बैठे व्यक्ति के बारे में इस आधार पर ग़लत-सही धारणाएँ बना ली जा सकती हैं.
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