Friday, September 14, 2018

कोर्ट को कानून में इस तरह का बदलाव करने का

म इंडिया के कप्तान विराट कोहली और बॉलीवुड एक्ट्रेस अनुष्का शर्मा को लेकर फैन्स के बीच खूब क्रेज रहता है। भारतीय क्रिकेट टीम इंग्लैंड में टेस्ट सीरीज खत्म होने के बाद लंदन से भारत के लिए रवाना हुई। इस दौरान विराट कोहली ने जो टी-शर्ट पहन रखी थी, वो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है।
दरअसल विराट की इस सफेद टी-शर्ट पर रेड कलर का हार्ट बना है और उसके नीचे A लिखा है। इसके पहले एक बार अनुष्का को विराट के नाम और जर्सी नंबर की टी-शर्ट पहने हुए भी देखा गया है। विराट की ये टी-शर्ट देखने के बाद लोग अनुष्का शर्मा को लकी कह रहे हैं। भारत को इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट सीरीज में 1-4 से हार का सामना करना पड़ा।
विराट फिलहाल अब क्रिकेट से ब्रेक पर होंगे और वो एशिया कप में टीम का हिस्सा नहीं हैं। विराट लंबे समय से लगातार क्रिकेट खेल रहे हैं और भारतीय क्रिकेट टीम के आने वाले शेड्यूल को देखते हुए आराम दिया गया है।
हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह समेत कई राजनीतिक हस्तियों ने शुभकामनाएं दी। इस मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट कर कहा कि भाषा वह माध्यम है जिससे कोई भी समाज अपना ज्ञान, संस्कृति और संस्कार भावी पीढ़ियों तक पहुंचाता है। उन्होंने आगे कहा कि हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में लगे भाषाविदों और हिंदी प्रेमियों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।
हिन्दी दिवस के मौके पर कई कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया और उसके महत्व पर जोर देते हुए इसके मूल स्वरूप को बनाए रखने पर ध्यान खींचा गया।
भारतीय दंड संहिता (आपीसी) की धारा 498ए के तहत दहेज प्रताड़ना केस में सर्वोच्च अदालत ने शुक्रवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में गिरफ्तारी हो या नहीं ये तय करने का अधिकार पुलिस को वापस दे दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर राज्य के डीजीपी को इस मुद्दे पर पुलिस अफसरों व कर्मियों में जागरुकता फैलाएं और उन्हें बताया जाए कि सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी को लेकर जो सिद्धान्त दिया है वो क्या है।

इसके साथ ही, गिरफ्तारी से पहले दहेज प्रताड़ना की जांच के लिए सिविल सोसायटी की कमेटी बनाने की गाइडलाइन को हटाया गया। लेकिन शीर्ष अदालत ने कहा कि पति और उसके रिश्तेदारों के सरंक्षण करने के लिए जमानत के रूप में अदालत के पास अधिकार मौजूद है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोर्ट इस तरह आपराधिक मामले की जांच के लिए सिविल कमेटी नियुक्त नहीं कर सकता, इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट के दो सदस्यीय बेंच के फैसले को संशोधित करते हुए तीन सदस्यी बेंच ने कहा कि इस तरह कोर्ट कानून की खामियों को नहीं भर सकता। ये कार्यपालिका द्वारा कानून लाकर ही करना संभव है। शीर्ष अदालत ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। सर्वोच्च अदालत ने दोहराया कि अगर दोनों पक्षों में समझौता होता है तो कानून के मुताबिक वो हाईकोर्ट जा सकते हैं। अगर पति पक्ष कोर्ट में अग्रिम जमानत अर्जी दाखिल करता है तो केस की उसी दिन सुनवाई की जा सकती है।
इससे पहले, इसी साल अप्रैल माह में सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। 2017 में इस मामले में चली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने आदेश दिया था कि दहेज उत्पीड़न की शिकायतों पर तुरंत गिरफ्तारी न हो और ऐसे मामलों को देखने के लिए हर ज़िले में फैमिली वेलफेयर कमिटी बनाया जाए। साथ ही, उसकी रिपोर्ट के आधार पर ही गिरफ्तारी जैसी कार्रवाई हो। दो जजों की बेंच के आदेश को ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
याचिका दायर कर कहा गया कि कोर्ट को कानून में इस तरह का बदलाव करने का हक नहीं है। कानून का मकसद महिलाओं को इंसाफ दिलाना है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के चलते देश भर में दहेज उत्पीड़न के मामलों में गिरफ्तारी बंद हो गई।ससे पहले, जुलाई 2017 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस यूयू ललित की दो जजों की बेंच ने महिलाओं के लिए बने कानूनों के दुरुपयोग के मामले को लेकर अहम निर्देश जारी किए थे। अपने आदेस में कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न कानून के दुरुपयोग की शिकायतों को देखते हुए ऐसे मामलों में तत्काल गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी थी। इसके अनुसार दहेज प्रताड़ना के मामलों में अब पति या ससुराल वालों की तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी। दहेज प्रताड़ना यानी आईपीसी की धारा 498-ए के दुरुपयोग से चिंतित सुप्रीम कोर्ट ने अहम कदम उठाते हुए इस सिलसिले में कुछ दिशा-निर्देश जारी भी किए थे।
दहेज कानून के दुरूपयोग के कई मामले आए सामने
एनसीआरबी के रिकॉर्ड के मुताबिक, साल 2009 के दौरान करीब 1 लाख 74 हजार लोगों की गिरफ्तारी 498ए के अंतर्गत हुई थी और इनमें 8,352 केस फर्जी साबित हुए। 2012 में 498ए के तहत केस दर्ज करने का रेट 93.6फीसदी रहा जबकि इसमें सिर्फ 14.3 फीसदी ही दोषी ठहराए गए थे।

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