"हमारी नज़र स्टेज की तरफ़ होती थी और हमें एकदम लय में क़दम आगे पीछे
रखने होते थे. इसके साथ हमारे हाथ में मशालें होती थीं, वो भी एकदम सही
लाइन में होनी चाहिए थीं."
इतनी परफेक्ट मार्च के लिए ही महीनों रिहर्सल कराई जाती थी.
"सबको पिछला पैर ठीक उस वक़्त उठाना होता था जब आपका अगला पैर ज़मीन पर पड़ गया हो. ये करना बहुत मुश्किल था. इसकी छह महीने तक रिहर्सल करते-करते लगों का वज़न कम से कम पांच किलो तक कम हो जाता था."
आयोजकों पर परफेक्शन का दबाव होता था. जिसका मार्च सबसे अच्छा होता था उसे मेडल मिलते थे और जिसका ख़राब हो जाता था उसे बुरी तरह डांटा जाता था. ही-चांग सत्ताधारी वर्कर्स पार्टी के सचिव थे. वो राजनीतिक कारणों के चलते चार साल पहले उत्तर कोरिया से भाग गए थे. उनका काम परेड के लिए देश के सबसे वफ़ादार परिवारों को चुनना होता था.
उस वक्त को याद करते हुए नो ही- चांग कहते हैं, "वो बहुत ही दर्दनाक अनुभव था. आम लोगों के साथ-साथ पार्टी के अधिकारियों को भी प्रताड़ना झेलनी होती थी, क्योंकि हमें परेड की शुरू से आख़िर तक सफलता की गारंटी देनी होती थी."
"मार्च के लिए सैन्य अकादमियों और प्रमुख सैन्य इकाइयों से भी लोगों को चुना जाता था. इसके अलावा गायकों, डांसरों और जिमनास्टों का भी चुनाव होता था. इन सब को चुनने का सिर्फ़ एक ही आधार था कि सब लोग किम परिवार के प्रति वफ़ादार हों."
नो बताते हैं, "हर व्यक्ति के बारे में पहले अच्छे से पता करना होता था. सबसे अहम ये देखना होता था कि उनके परिवार का क्या रिकॉर्ड रहा है. उनके परिवार का रिकॉर्ड साफ़-सुथरा होना ज़रूरी था, वो देश के प्रति वफ़ादार होने चाहिेए थे."
उत्तर कोरिया से भागे कई लोगों ने बताया कि उन्हें परेड के लिए कई महीनों तक रोज़ाना 10-10 घंटे की ट्रेनिंग कराई जाती थी.
कुछ लोग बीमार हो जाते थे, कुछ को चोटें आती थीं और किसी की हालत परेड में हिस्सा लेने लायक नहीं बचती थी, तो उसका रिप्लेसमेंट भी ढूंढ़ना होता था.
लेकिन वो नेता ये सब कैसे कर सकता है जिसने उत्तर कोरिया के लोगों की ज़िंदगी को बेहतर बनाने का वादा किया हो? किम जोंग-उन उत्तर कोरिया को परमाणु संपन्न देश घोषित कर चुके हैं और कह चुके हैं कि उनका मक़सद देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ाना है.
उत्तर कोरिया की सरकारी मीडिया ने भी रविवार को होने वाली परेड को "जीत का जश्न और देश की अर्थव्यवस्था के तेज़ी से होते विकास को दर्शाने वाला" क़रार दिया है.
लेकिन माना जा रहा है कि स्थापना दिवस के ख़ास मौके पर किम जोंग-उन बड़ी और अहम घोषणा कर सकते हैं. कई विश्लेषकों का मानना है कि वो ऐसी उपलब्धि चाहते हैं जो उनके पिता और दादा भी हासिल नहीं कर पाए- वो कोरिया के युद्ध की समाप्ति की घोषणा करना चाहते हैं.
ये युद्ध एक सैन्य समझौते के बाद 1953 में ख़त्म हो गया था. लेकिन कभी कोई शांति समझौता नहीं हुआ. मरीका के साथ बातचीत अटकने के बाद किम जों-उन ने इस हफ्ते दक्षिण कोरिया के प्रतिनिधिमंडल का अपने देश में स्वागत किया और कोरियाई प्रायद्वीप को "परमाणु-मुक्त कराने की अपनी प्रतिबद्धता" को दोहराया.
दक्षिण कोरिया के अधिकारियों के मुताबिक किम इस बात से परेशान है कि उनकी सकारात्मक कोशिशों पर दुनिया भरोसा नहीं कर रही है.
वो अमरीका के साथ रिश्ते बेहतर करने की इच्छा जता चुके हैं. वो जानते हैं कि ऐसा करने के लिए परमाणु निरस्त्रीकरण पहली शर्त है.
किम ट्रंप के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं, ट्रंप भी ट्वीट कर जवाब दे चुके हैं कि "वो साथ मिलकर ये करने को तैयार हैं."
हालांकि इन कोशिशों की राह में अब भी एक बड़ा रोड़ा है. किम जोंग-उन उत्तर कोरिया के अबतक के सबसे खुले विचारों के नेता तो दिखना चाहते हैं, लेकिन वो दुनिया को अब भी उत्तर कोरिया का एक सीमित रूप ही दिखाना चाहते हैं. और विदेशी मीडिया को परेड के लिए आमंत्रित करना एक ऐसा ही क़दम है.
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक उत्तर कोरिया की क़रीब 40 फ़ीसदी यानी एक करोड़ से ज़्यादा आबादी को मानवीय सहायता की ज़रूरत है. देश के करीब 20 फ़ीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं.
कोरियाई प्रायद्वीप के लिए ये साल सबसे गर्म रहा. उत्तर कोरिया के सरकारी मीडिया के मुताबिक इस साल "अभूतपूर्व प्राकृतिक आपदा" आई है.
रेड क्रॉस सोसायटी ने भी चेतावनी दी है कि चावल, मक्का और दूसरी फसलें सूख चुकी हैं, जिससे "भीषण खाद्य सुरक्षा संकट" का ख़तरा खड़ा हो गया है.
अगस्त में आंधी के साथ आई बाढ़ की चपेट में आने से कम से कम 76 लोगों की मौत हुई थी और क़रीब इतनी ही संख्या में लोग लापता हुए जबकि हज़ारों लोग बेघर हो गए थे.
ये उम्मीद कम ही है कि विदेशी मीडिया को तबाही का ये मंज़र दिखाया जाएगा. बल्कि किम और ट्रंप की हाल ही में हुई हाई-प्रोफाइन समिट के बावजूद मीडिया पर कड़ा नियंत्रण रखा जाएगा.
नो ही-चांग याद करते हैं कि भीषण गर्मी में मार्च कराई जाती थी और लोग लगभग भूखे पेट मार्च करते थे.
"ओह वो भूख. भूखा रहना सबसे बड़ी बात थी. ख़ासकर किम जोंग-इल के ज़माने में तो खाना बहुत ही कम था. सभी एक लाख लोग सुबह से रात तक काम करते थे. उनके लिए सबसे बड़ी परेशानी दो वक़्त की रोटी मिल पाना था."
फिर भी जब नो ही-चांग से पूछा गया कि एक मैनेजर के तौर पर क्या वो परेड में शामिल उन लोगों से माफ़ी मांगने चाहेंगे. तो उन्होंने बड़े ही सख़्त लहज़े में ना कह दिया.उत्तर कोरिया में हमें सिखाया जाता था कि अगर दीवार हिलती है तो पहाड़ को भी हिलना ही होगा. इसका मतलब कि अगर किम इल-सुंग या किम जोंग-इल 'आह' कहते हैं तो हर नागरिक को 'आह' कहना है. वहां लोगों को सिर्फ़ "जी सर" कहना आता है. वहां सिस्टम इसी तरह काम करता है."
इस वफ़ादारी और गर्व की भावना को ही परेड और देश की सफलता की वजह समझा जाता है. किम जी-योंग याद करते हैं कि जब उनके दोस्त और सैनिक अपने नेता के सामने से गुज़रते थे तो ज़ोर से "लॉन्ग लिव" का नारा लगाते थे.
"उन्हें ये इतनी तेज़ चिल्लाकर बोलना होता था कि 100 मीटर लंबी मार्च के आख़िर तक ये आवाज़ पहुंचे. हमने उनसे बात करने की कोशिश की लेकिन अब वो अपनी आवाज़ खो चुके हैं."
एक दर्शक होने के नाते किम कहते हैं कि ऐसे देश में सर्वाइव करने के लिए भी तो यही एक तरीका है.
"हम सब पार्टी के बड़े-छोटे अधिकारियों के बच्चे थे. अगर हम में से कोई शिकायत कर देता तो उसे ग़ायब कर दिया जाता था. इसलिए वहां कोई शिकायत नहीं करता."
"विदेशियों को ये परेड खूब पसंद आएगी, लेकिन मैं उन्हें बताया चाहता हूं कि परेड में शामिल होने वाले वो लोग बिना कुछ खाए छह महीने तक मेहनत करते रहे हैं. उन्होंने छह महीने तक इतना पसीना क्यों बहाया - सिर्फ़ 10 मिनट की मार्च के लिए? ये दिल को तोड़ने वाला है. मैं चाहता हूं लोग ख़ासकर पत्रकार उत्तर कोरिया के उस रूप को देखें जो कहीं दबा-छिपा है."
लेकिन इतनी मुसीबतें झेलने के बाद भी लोगों के मन में देशभक्ति की भवना है.
नो कहते हैं कि अगर उन्हें मौका मिलेगा तो वो उत्तर कोरिया लौटना चाहेंगे.
"100% मैं वापस जाऊंगा. अपने शहर के बारे में सोचकर मुझे रोना आता है. बिल्कुल, मैं खुशी से वापस जाना चाहूंगा. मैं हमेशा से प्योंगयांग वापस जाना चाहता हूं. कौन अपने वतन वापस नहीं लौटना चाहेगा?"
इतनी परफेक्ट मार्च के लिए ही महीनों रिहर्सल कराई जाती थी.
"सबको पिछला पैर ठीक उस वक़्त उठाना होता था जब आपका अगला पैर ज़मीन पर पड़ गया हो. ये करना बहुत मुश्किल था. इसकी छह महीने तक रिहर्सल करते-करते लगों का वज़न कम से कम पांच किलो तक कम हो जाता था."
आयोजकों पर परफेक्शन का दबाव होता था. जिसका मार्च सबसे अच्छा होता था उसे मेडल मिलते थे और जिसका ख़राब हो जाता था उसे बुरी तरह डांटा जाता था. ही-चांग सत्ताधारी वर्कर्स पार्टी के सचिव थे. वो राजनीतिक कारणों के चलते चार साल पहले उत्तर कोरिया से भाग गए थे. उनका काम परेड के लिए देश के सबसे वफ़ादार परिवारों को चुनना होता था.
उस वक्त को याद करते हुए नो ही- चांग कहते हैं, "वो बहुत ही दर्दनाक अनुभव था. आम लोगों के साथ-साथ पार्टी के अधिकारियों को भी प्रताड़ना झेलनी होती थी, क्योंकि हमें परेड की शुरू से आख़िर तक सफलता की गारंटी देनी होती थी."
"मार्च के लिए सैन्य अकादमियों और प्रमुख सैन्य इकाइयों से भी लोगों को चुना जाता था. इसके अलावा गायकों, डांसरों और जिमनास्टों का भी चुनाव होता था. इन सब को चुनने का सिर्फ़ एक ही आधार था कि सब लोग किम परिवार के प्रति वफ़ादार हों."
नो बताते हैं, "हर व्यक्ति के बारे में पहले अच्छे से पता करना होता था. सबसे अहम ये देखना होता था कि उनके परिवार का क्या रिकॉर्ड रहा है. उनके परिवार का रिकॉर्ड साफ़-सुथरा होना ज़रूरी था, वो देश के प्रति वफ़ादार होने चाहिेए थे."
उत्तर कोरिया से भागे कई लोगों ने बताया कि उन्हें परेड के लिए कई महीनों तक रोज़ाना 10-10 घंटे की ट्रेनिंग कराई जाती थी.
कुछ लोग बीमार हो जाते थे, कुछ को चोटें आती थीं और किसी की हालत परेड में हिस्सा लेने लायक नहीं बचती थी, तो उसका रिप्लेसमेंट भी ढूंढ़ना होता था.
लेकिन वो नेता ये सब कैसे कर सकता है जिसने उत्तर कोरिया के लोगों की ज़िंदगी को बेहतर बनाने का वादा किया हो? किम जोंग-उन उत्तर कोरिया को परमाणु संपन्न देश घोषित कर चुके हैं और कह चुके हैं कि उनका मक़सद देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ाना है.
उत्तर कोरिया की सरकारी मीडिया ने भी रविवार को होने वाली परेड को "जीत का जश्न और देश की अर्थव्यवस्था के तेज़ी से होते विकास को दर्शाने वाला" क़रार दिया है.
लेकिन माना जा रहा है कि स्थापना दिवस के ख़ास मौके पर किम जोंग-उन बड़ी और अहम घोषणा कर सकते हैं. कई विश्लेषकों का मानना है कि वो ऐसी उपलब्धि चाहते हैं जो उनके पिता और दादा भी हासिल नहीं कर पाए- वो कोरिया के युद्ध की समाप्ति की घोषणा करना चाहते हैं.
ये युद्ध एक सैन्य समझौते के बाद 1953 में ख़त्म हो गया था. लेकिन कभी कोई शांति समझौता नहीं हुआ. मरीका के साथ बातचीत अटकने के बाद किम जों-उन ने इस हफ्ते दक्षिण कोरिया के प्रतिनिधिमंडल का अपने देश में स्वागत किया और कोरियाई प्रायद्वीप को "परमाणु-मुक्त कराने की अपनी प्रतिबद्धता" को दोहराया.
दक्षिण कोरिया के अधिकारियों के मुताबिक किम इस बात से परेशान है कि उनकी सकारात्मक कोशिशों पर दुनिया भरोसा नहीं कर रही है.
वो अमरीका के साथ रिश्ते बेहतर करने की इच्छा जता चुके हैं. वो जानते हैं कि ऐसा करने के लिए परमाणु निरस्त्रीकरण पहली शर्त है.
किम ट्रंप के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं, ट्रंप भी ट्वीट कर जवाब दे चुके हैं कि "वो साथ मिलकर ये करने को तैयार हैं."
हालांकि इन कोशिशों की राह में अब भी एक बड़ा रोड़ा है. किम जोंग-उन उत्तर कोरिया के अबतक के सबसे खुले विचारों के नेता तो दिखना चाहते हैं, लेकिन वो दुनिया को अब भी उत्तर कोरिया का एक सीमित रूप ही दिखाना चाहते हैं. और विदेशी मीडिया को परेड के लिए आमंत्रित करना एक ऐसा ही क़दम है.
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक उत्तर कोरिया की क़रीब 40 फ़ीसदी यानी एक करोड़ से ज़्यादा आबादी को मानवीय सहायता की ज़रूरत है. देश के करीब 20 फ़ीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं.
कोरियाई प्रायद्वीप के लिए ये साल सबसे गर्म रहा. उत्तर कोरिया के सरकारी मीडिया के मुताबिक इस साल "अभूतपूर्व प्राकृतिक आपदा" आई है.
रेड क्रॉस सोसायटी ने भी चेतावनी दी है कि चावल, मक्का और दूसरी फसलें सूख चुकी हैं, जिससे "भीषण खाद्य सुरक्षा संकट" का ख़तरा खड़ा हो गया है.
अगस्त में आंधी के साथ आई बाढ़ की चपेट में आने से कम से कम 76 लोगों की मौत हुई थी और क़रीब इतनी ही संख्या में लोग लापता हुए जबकि हज़ारों लोग बेघर हो गए थे.
ये उम्मीद कम ही है कि विदेशी मीडिया को तबाही का ये मंज़र दिखाया जाएगा. बल्कि किम और ट्रंप की हाल ही में हुई हाई-प्रोफाइन समिट के बावजूद मीडिया पर कड़ा नियंत्रण रखा जाएगा.
नो ही-चांग याद करते हैं कि भीषण गर्मी में मार्च कराई जाती थी और लोग लगभग भूखे पेट मार्च करते थे.
"ओह वो भूख. भूखा रहना सबसे बड़ी बात थी. ख़ासकर किम जोंग-इल के ज़माने में तो खाना बहुत ही कम था. सभी एक लाख लोग सुबह से रात तक काम करते थे. उनके लिए सबसे बड़ी परेशानी दो वक़्त की रोटी मिल पाना था."
फिर भी जब नो ही-चांग से पूछा गया कि एक मैनेजर के तौर पर क्या वो परेड में शामिल उन लोगों से माफ़ी मांगने चाहेंगे. तो उन्होंने बड़े ही सख़्त लहज़े में ना कह दिया.उत्तर कोरिया में हमें सिखाया जाता था कि अगर दीवार हिलती है तो पहाड़ को भी हिलना ही होगा. इसका मतलब कि अगर किम इल-सुंग या किम जोंग-इल 'आह' कहते हैं तो हर नागरिक को 'आह' कहना है. वहां लोगों को सिर्फ़ "जी सर" कहना आता है. वहां सिस्टम इसी तरह काम करता है."
इस वफ़ादारी और गर्व की भावना को ही परेड और देश की सफलता की वजह समझा जाता है. किम जी-योंग याद करते हैं कि जब उनके दोस्त और सैनिक अपने नेता के सामने से गुज़रते थे तो ज़ोर से "लॉन्ग लिव" का नारा लगाते थे.
"उन्हें ये इतनी तेज़ चिल्लाकर बोलना होता था कि 100 मीटर लंबी मार्च के आख़िर तक ये आवाज़ पहुंचे. हमने उनसे बात करने की कोशिश की लेकिन अब वो अपनी आवाज़ खो चुके हैं."
एक दर्शक होने के नाते किम कहते हैं कि ऐसे देश में सर्वाइव करने के लिए भी तो यही एक तरीका है.
"हम सब पार्टी के बड़े-छोटे अधिकारियों के बच्चे थे. अगर हम में से कोई शिकायत कर देता तो उसे ग़ायब कर दिया जाता था. इसलिए वहां कोई शिकायत नहीं करता."
"विदेशियों को ये परेड खूब पसंद आएगी, लेकिन मैं उन्हें बताया चाहता हूं कि परेड में शामिल होने वाले वो लोग बिना कुछ खाए छह महीने तक मेहनत करते रहे हैं. उन्होंने छह महीने तक इतना पसीना क्यों बहाया - सिर्फ़ 10 मिनट की मार्च के लिए? ये दिल को तोड़ने वाला है. मैं चाहता हूं लोग ख़ासकर पत्रकार उत्तर कोरिया के उस रूप को देखें जो कहीं दबा-छिपा है."
लेकिन इतनी मुसीबतें झेलने के बाद भी लोगों के मन में देशभक्ति की भवना है.
नो कहते हैं कि अगर उन्हें मौका मिलेगा तो वो उत्तर कोरिया लौटना चाहेंगे.
"100% मैं वापस जाऊंगा. अपने शहर के बारे में सोचकर मुझे रोना आता है. बिल्कुल, मैं खुशी से वापस जाना चाहूंगा. मैं हमेशा से प्योंगयांग वापस जाना चाहता हूं. कौन अपने वतन वापस नहीं लौटना चाहेगा?"
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