Tuesday, September 24, 2019

फ़ातिमा ने उनके अंतिम समय का वर्णन करते हुए 'सांग

लेकिन बेनज़ीर की माँ नुसरत भुट्टो ने अपने बेटे का पक्ष लिया. उनकी वापसी के लिए उन्होंने बाक़ायदा मुहिम चलाई.
मुर्तज़ा वापस आए और आते ही उन्होंने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, "मुझे अपने देश से काफ़ी समय तक दूर रखा गया. मुझे दो चीज़ें बताई गईं. एक तो ये कि यहाँ मेरी ज़िदगी सुरक्षित नहीं है और दूसरे अगर मैं वापस लौटता हूं तो इससे मेरी बहन की राजनीतिक स्थिति ख़राब होगी."
"कहने का मतलब ये कि उन्होंने डर और अपराध बोध की भावना पर काम किया. डर का मेरे लिए कोई महत्व नहीं था क्योंकि मुझे पता था कि मैं बेकसूर हूँ."
"हाँ, अपराध बोध की भावना ज़रूर जारी रही, क्योंकि वो पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं और मैं इस विचार के साथ नहीं रहना चाहता था कि अगर मैं लौटता हूँ और सरकार गिर जाती है तो मुझे इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा."
"लेकिन एक समय ऐसा आया कि मेरे लिए और बाहर रहना संभव नहीं हो सका. मेरी माँ शुरू से ही कह रही थीं कि मुझे वापस आना चाहिए."
मुर्तज़ा के वापस आते ही उनके गृह नगर लरकाना में पुलिस ने उनके समर्थकों पर गोली चला दी.
उनकी माँ नुसरत भुट्टो इससे इतनी व्यथित हुईं कि इसके लिए उन्होंने अपनी पुत्री बेनज़ीर को दोषी माना. वो उन्हें बेनज़ीर के बजाए 'मिसेज़ ज़रदारी' के नाम से पुकारने लगीं.
नुसरत ने कहा, "बेनज़ीर कहा करती थीं कि नवाज़ शरीफ़ की सरकार पुलिस सरकार है. मगर आज की सरकार पुलिस की सरकार नहीं है तो और क्या है? जो नवाज़ शरीफ़ और ज़िया उल हक़ जैसे तानाशाह किया करते थे, वो भी वही चीज़ कर रही हैं."
मुर्तज़ा और उनकी बहन के बीच कटुता बढ़ने लगी. मुर्तज़ा की ज़ुबान तीखी होती चली गई और उसका निशाना बनी तत्कालीन सरकार.
मुर्तज़ा ने कहा, "मैं कहता हूँ सोच लो. हिसाब किताब रखो अपना. मेरे कारकूनों को हाथ मत लगाओ. उनको तंग मत करो. मैं वो ईसाई नहीं हूँ कि एक तरफ़ से थप्पड़ मारो तो मैं कह दूँगा कि दूसरी तरफ़ भी मार दो. किसी ने हमें थप्पड़ मारा तो हम टाँगें तोड़ देगें उसकी."
20 सितंबर, 1996 को उन्होंने एक और संवाददाता सम्मेलन किया और पुलिस पर ज़्यादतियों का आरोप लगाया.
मुर्तज़ा ने कहा, "पुलिस अधिकारी राज्य की वर्दी पहनने लायक नहीं हैं. वो अपराधी हैं. उन्होंने कराची में नरसंहार किया है. उनका समय अब समाप्त होने वाला है. मैं उन्हें चुनौती देता हूँ कि वो मुझे गिरफ़्तार करें, अगर वो इसका राजनीतिक परिणाम झेल सकने की हिम्मत रखते हैं तो."
उसी दिन शाम को आठ बजे मुर्तज़ा भुट्टो रैली और संवाददाता सम्मेलन करने के बाद अपने घर वापस लौट रहे थे.
उनकी बेटी फ़ातिमा भुट्टो अपनी किताब 'सांग्स ऑफ़ ब्लड एंड सौर्ड' में लिखती हैं, "मेरी माँ रसोई में खाना बना रही थीं. मैं अपने छोटे भाई ज़ुल्फ़ी के साथ अपने माँ बाप के शयन कक्ष में टीवी देख रही थी. तभी मेरी एक दोस्त नूर्या का फ़ोन आया. अभी हम बाते ही कर रहे थे कि मुझ एक गोली चलने की आवाज़ सुनाई दी."
"इसके बाद तो गोलियों की झड़ी सी लग गई. मैंने नूर्या से कहा कि मैं थोड़ी देर बाद फ़ोन करती हूँ. मैं ज़ुल्फ़ी को गोद में लिए ड्राइंग रूम में भागी. मम्मी भी दौड़ती हुई वहाँ पहुंच गई. हम वहाँ आधे घंटे तक बैठे रहे. हमने अपने चौकीदार ये देखने बाहर भेजा कि वहाँ क्या हो रहा है."
"उसने बताया कि बाहर पुलिस फैली हुई है. पुलिस ने मुझे घर से बाहर नहीं निकलने दिया. उसका कहना था कि बाहर डकैती पड़ी है. हालात सुधरने तक तुम घर पर ही रहो."
जैसे जैसे समय बीतता गया, फ़ातिमा और ग़िनवा भुट्टो की परेशानी बढ़ती गई. जब उनसे नहीं बर्दाश्त हुआ तो उन्होंने अपनी माँ से कहा कि वो अपनी बुआ 'वादी को इस्लामाबाद फ़ोन करने जा रही हैं.
बाद में उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, "मेरे घर के आसपास काफ़ी पुलिस तैनात थी. जब बहुत देर तक मेरे पिता नहीं आए तो मैंने अपनी बुआ को फ़ोन करने का फ़ैसला किया. काफ़ी देर बाद उनके पति आसिफ़ ज़रदारी फ़ोन पर आए."
"उन्होंने कहा कि मैं बुआ से बात नहीं कर सकती. मैंने जब ये कहा कि ये बहुत ज़रूरी है तो उन्होंने कहा कि वो फ़ोन पर नहीं आ सकतीं. जब मैंने बहुत ज़ोर डाला तो उन्होंने बहुत ठंडेपन से कहा कि तुम्हें पता नहीं कि तुम्हारे पिता को गोली लग गई है."
फ़ातिमा और उनकी माँ गिनवा जल्दी से कार में बैठ कर मिडईस्ट अस्पताल पहुंचीं.
बाद में फ़ातिमा भुट्टो ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "मुझे याद है जब मैं अस्पताल में घुसी तो मुझे अपने पिता के पैर दिखाई दिए. मैं समझी कि मैं नीचे गिर डाउंगी. ममी दौड़ कर पापा के पास गईं. वो एक नीची पलंग पर बेहोश लेटे हुए थे. मेरी माँ ज़ोर से चिल्लाईं, 'जागो मीर जागो!"
"मैंने पापा के चेहरे को छुआ. मेरी उंगलियों पर उनका ख़ून लग गया. उनका चेहरा अभी भी गर्म था. मैं इतना घबरा गई कि मैं साँस नहीं ले पा रही थी. बाद में डॉक्टर ग़फ़्फ़ार ने मुझे बताया कि पापा साँस लेन की कोशिश कर रहे थे, लेकिन ले नहीं पा रहे थे."
"उनके गले में इतना ख़ून भर चुका था कि उनके फेफड़ों तक हवा पहुंचाने के लिए ट्यूब नहीं डाली जा सकी. बाद में उनके गले की नली में ट्यूब डालने के लिए छेद किया गया ताकि वो साँस ले सकें. ये सब हो रहा था कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा."

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