शोधकर्ताओं ने पश्चिमी चीन के कुछ हिस्सों में कैनबिस (गांजे) के पौधों के उपयोग के शुरुआती सबूत उजागर किए हैं.
रिसर्च
बताती है कि कैनबिस के पौधों का उपयोग 2,500 साल पहले से किया जा रहा है और ये शायद उस समय की परंपराओं या धार्मिक गतिविधियों से जुड़ा था. दफ़न की गई लकड़ी से मिले कैनबिस के ज्वलन पदार्थ से इसकी पहचान हुई है.
कैनबिस में साइकोएक्टिव कंपाउंड टीएचसी का उच्च स्तर पाया गया है, जिसका हवाला देते हुए बताया जा रहा है कि लोगों को इसके प्रभावों के बारे में अच्छी तरह से पता था.
पूर्वी एशिया में कैनबिस के पौधों की खेती कम से कम 4,000 ईसा पूर्व उनके तेलीय बीज और फ़ाइबर के लिए शुरू हुई थी.
कैनबिस की शुरुआती फसल में टीएचसी की मात्रा का निम्न स्तर पाया जाता था.
कैनबिस के ये ज्वलन पदार्थ पामीर की ऊंची पहाड़ियों पर मिले हैं.
वैज्ञानिक सोचते हैं कि तत्कालीन लोग कैनबिस के पौधों से बनी अफ़ीम को अंगीठी में जलाकर फिर उसका इस्तेमाल करते थे.
ऊंचाई वाले वातावरण को कैनबिस के पौधों में बढ़ते टीएचसी का कारण बताया गया है. क्योंकि ऊंचे स्थान पर तापमान और पोषक तत्व कम होते हैं.
लेकिन इसी के साथ ये अनुमान भी लगाया जा रहा है कि लोगों ने जानबूझकर अन्य जंगली पौधों के बजाय अधिक टीएचसी वाले पौधों की खेती की होगी.
ये इस बात का साफ़ सबूत है कि कैनबिस के पौधे नशा करने के लिए ही इस्तेमाल किए जाते थे.
वैज्ञानिकों ने कैनबिस के ज्वलन पदार्थ में मौजूद मिश्रण की जांच करने के लिए क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री नामक एक विधि का प्रयोग किया है.
उनकी जांच में जो परिणाम आया उससे साफ़ हुआ कि ये ज्वलन पदार्थ कैनबिस के पौधों का ही है.
चीन के शिनजियांग क्षेत्र में और रूस के अल्टाई पहाड़ों में मिले साक्ष्य भी कैनबिस की उपस्थिति का दावा करते हैं.
इसके अलावा, यहां पाई गई मानव हड्डियों पर किए गए परीक्षण बताते हैं कि यहां के कुछ लोग स्थानीय स्तर पर विकसित नहीं हुए थे.
जर्मनी के जेना में मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर द साइंस ऑफ ह्यूमन हिस्ट्री के निदेशक निकोल बोइविन ने कहा, "खोज इस बात का समर्थन करती है कि सबसे पहले कैनबिस के पौधों का उपयोग पूर्वी मध्य एशिया के पहाड़ी क्षेत्रों में किया गया था, इसके बाद ये पूरे विश्व में फैल गया.''
पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू
अख़बारों में इस हफ़्ते पाकिस्तान में बढ़ती महंगाई, ज़रदारी की गिरफ़्तारी, एससीओ सम्मेलन से जुड़ी ख़बरें सुर्ख़ियों में रहीं.
सबसे
पहले बात एससीओ सम्मेलन की. अख़बार दुनिया के अनुसार शंघाई सहयोग संगठन
(एससीओ) की बैठक में हिस्सा लेने किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक पहुंचे इमरान ख़ान ने एक टीवी चैनल को इंटरव्यू देते हुए कहा, "पाकिस्तान भारत के साथ दोस्ती चाहता है. हम भारत से संबंध बेहतर बनाने के लिए रूस की मध्यस्थता भी स्वीकार करने को तैयार हैं." "हम क्षेत्र में अमन चाहते हैं. जंग से किसी का कोई फ़ायदा नहीं है. भारत-पाक संबंध में सबसे बड़ी रुकावट कश्मीर है, जिसे बातचीत के ज़रिए हल किया जा सकता है.''
लेकिन पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी की राय थोड़ी अलग है.
अख़बार नवा-ए-वक्त के अनुसार पाकिस्तानी विदेश मंत्री का कहना था कि एससीओ बैठक के दौरान इमरान ख़ान और भारतीय प्रधानमंत्री ने एक दूसरे से हाथ मिलाया और थोड़ी देर तक दोनों में बातचीत भी हुई.
क़ुरैशी का कहना था, "मोदी के साथ मुलाक़ात पहले से तय नहीं थी. दुनियादारी थी वो हुई. भारत अभी तक अपने चुनावी नतीजों के ज़ेहनी दबाव से आज़ाद नहीं हो पाया है. बातचीत का फ़ैसला भारत को करना है."
"बातचीत के लिए न तो कोई जल्दी है, न कोई घबराहट है. मोदी मुझे खोए-खोए से नज़र आए. ऐसा लग रहा था कि मोदी जी हमारे प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से आंखे नहीं मिला पा रहे हैं.''
पाकिस्तान में महंगाई पर क़ाबू पाने की तमाम कोशिशें नाकाम साबित हो रही हैं. सोना-चांदी के अलावा रोज़मर्रा की इस्तेमाल की जाने वाली चीज़ों की क़ीमत भी आसमान छू रही हैं.
पाकिस्तानी रुपया भी लगातार कमज़ोर होता जा रहा है. अख़बार जंग के अनुसार एक अमरीकी डॉलर 157.50 पाकिस्तानी रुपये के बराबर हो गया है. पेट्रोल, गैस और बिजली की क़ीमत भी रोज़ाना बढ़ती जा रही है.
सरकार रोज़ाना कह रही है कि जल्द ही इस पर क़ाबू पा लिया जाएगा. प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने अपने मंत्रियों और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक करने के बाद कहा कि पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था अब पटरी पर लौट आई है.
अख़बार जंग के अनुसार इमरान ख़ान ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा, ''पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था स्थिर हो चुकी है. कठिन रास्ता था जो तय कर लिया गया है. अब समय आ गया है कि पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था टेक-ऑफ़ करेगी.''
लेकिन सच्चाई ये है कि महंगाई कम होने के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं.
अख़बार एक्सप्रेस के मुताबिक़ जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख और सिनेटर सिराज-उल-हक़ ने कहा है कि महंगाई, बेरोज़गारी, आईएमएफ़ और वर्ल्ड बैंक की कथित ग़ुलामी के ख़िलाफ़ उनका संगठन 16 जून से लाहौर से एक आंदोलन शुरू करेगा. उनके अनुसार ये आंदोलन पूरे पाकिस्तान में शुरू किया जाएगा.
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